आषाढस्य प्रथम दिवसे अर्थात मेघदूत हिन्दी मे

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प्रेमभावना विश्वव्यापी है।  हालां कि इसे व्यक्त करने कि पद्धती मे अंतर हैं। आज हम इसे व्हॅलेन्टाइन डे के रूप में मनाते हैं। प्राचिन काल में इसे ’वसंतोत्सव’ के रूप में मनाया जाता था। संस्कृत काव्य परंपरा में भी इसे भिन्न-भिन्न रुप में व्यक्त किया हैं।

ऐसा ही एक प्रेमकाव्य हैं ’मेघदूतम’। जिसे दुनियाभर के बुद्धीजीवीयों ने सराहा हैं, चाहा है। यह एक प्रेमसन्देश है। जिसे शापीत यक्ष ने अपनि प्रिया के लिये मेघरुप सन्देशवाहक के साथ भेजा है। यक्ष केवल प्रियतम के लिये सन्देश ही नहि भेजता अपितू मेघ को वहां तक जाने का मार्ग भी बताता है। उस मार्ग में आने वाले नगर, नगरजन, नदियाँ, पर्वत और निसर्ग इन सब की विशेषताओं का भी वर्णन करता है। किंतु प्रेमसन्देश इस काव्य की आत्मा है।

इस काव्य के कुछ चुने हुए कुसुम मैने हिंदि में रुपांतरित करने की कोशिश कि है। अगर आपको यह पसन्द आये तो कविश्रेष्ठ कलिदास की प्रतिभा का करिश्मा है। इसे पढकर अगर आपको मेघदुतम पढने कि इच्छा जागे तो मैं समझुँगा मेरा प्रयास सफल रहा।

एक यक्ष को उसका स्वामी उसकी गलती की वजह से, उसे अपने प्रियजनों से दूर रामगिरी पर्वत पर अकेले रहने का शाप देता हैं। इस एकांत मे उसकि अवस्था क्या थी और काले मेघ को देखकर पिया को सन्देस देने कि इच्छा से उसकि अवस्था क्या होति है यह निम्न पन्क्ति में कवी व्यक्त करता है।

तस्मिन्नद्रौ कतिचिदबलाविप्रयुक्तः स कामी
नीत्वा मासान्कनकवलय भ्रंशरिक्त्प्रकोष्ठः।
अषाढस्य प्रथमदिवसे मेघमाष्लिष्टसानुं
वप्रक्रीडापरिणत गजप्रेक्षणीयं ददर्श।

प्रेम वियोगी वह इक प्रेमी रहता था जब रामगीरि पर
हाथों से कंकण गीर जाये इतने कृश हो गये उसके कर
आषाढ के प्रथम दिन पर्वत पर जब वह काला मेघ झूका था
उन्मत आतुर तट से भिडने कोई काला गज डँटा था

जब वह मेघ को उज्जैन से जाने का परामर्श देता है तब वहाँ कि सुन्दरियों के बारे में बताता है-

वक्रः पन्था यदपि भवतः प्रस्थित्तस्योत्तराशां
सौधोत्सङग प्रणयविमुखो मा स्म भूरुज्जायिन्याः।
विद्युद्दामस्फुरितचकितैस्तत्र पौराङगनानां
लोलापाङगैर्यादि न रमसे लोचनैर्वञ्चितोs शि ॥

थोडी टेढी राह है फिर भी, मित्र मेघ तु उत्तर जाना
उज्जैनी के सौंध मनोहर, अवश्य मेरे मित्र देखना
व्यर्थ जीना गर तुम ना देखो, पौरजनों की ललनायें सुंदर
तड़ाग चमके-नेत्रपल्लवी, करते उनके चंचल नैना

लहरें उठती निर्विंध्या नदी और पंछियोंकी कतार उसे नदी रुपी स्त्री की मेखला लगते हैं और पानी में उठता भँवर उसकी नाभी।

वीचिक्षोभस्तनितविहगश्रेणीकाञ्ची गुणायाः
संसर्पन्त्याः स्खलितसुभगं दर्शितावर्तनाभे:।
निर्विन्ध्यायाः पथि भव रसाभ्यन्तरः सन्निपत्य
स्त्रीणामाद्यं प्रणयवचनं विभ्रमो हि प्रियेषु

लहरें उठती पंछी मचले लगे मेखला जैसे फीसली
भँवर बना है जल मे ऐसे  जैसे नभी निर्विंध्या की
प्रणयातुर उस सरितापर तब झूक कर करना तुम रस सेवन
शौंख अदायें सुंदरीयोंकी होता प्रथम प्रणय आमन्त्रण

और पीया मिलन को उत्सुक ललनाओं की दशा का वर्णन यक्ष इस प्रकार वर्णन करता है-

गच्छन्तिनां रमण्वसति योषितां तत्र नक्तं
रुध्दालोके नरपतिपथे सूचिभेद्यैस्तमोभिः।
सौदामन्या कनकनिकषस्निग्धया दर्शयोर्वी
तोयोत्सर्गस्तनितमुखरो मा च भूर्विक्लवास्ताः॥

आतूर अभिसरोत्सूक ललनायें, पिया मिलन को निकलेगी जब
रात अंधेरी, पथ भी ओझल, स्तिमित रह जायेगी वो तब
कान्चन रेखावत बिजली चमकाकर, उन्हे जरासी राह दिखाना
बहु कोमल होता दिल उनका, गरज बरस ना उन्हे डराना


१- कसौटी के पत्थर पर जैसे सुवर्न कि रेखा उमटी हो।

यह यक्ष उस मेघ को रुठि सखी को कैसे मनाया जाये इसका भी मार्गदर्शन करता है।

तस्मिन्काले नयनसलिलं योषितां खण्डितानां
शान्तिं नेयं प्रणयिभिरतो वर्त्म भनोस्त्यजाशु।
प्रलेयास्त्रं कमलवदनात्सो s पि हर्तुं नलिन्यः
प्रत्यावृत्तस्त्वयि कररुधि स्यदनल्पाभ्यसूयः।

अश्रु भरे नयनोंपर से, बडे प्यार से हाथ फेरना
योग्य समय है रुठी सखी को, जब तुमको हो मेघ मनाना
उस रवी का न मार्ग रोकना, किरणों से हट जाना दूर
कमल मुखी के आँसु ओंस के, पोंछने जो है आतूर

गंभिरा (नदी) के जल में मेघ का प्रतिबिंब कैसे दिखेगा इसका वर्णन यक्ष कुछ इस प्रकार करता है –

गम्भीराया: पयसि सरितश्चेत्सीव प्रसन्ने
छायात्मापि प्रकृतीसुभगो लप्स्यते ते प्रवेशम।
तस्मादस्याः कुमुदविशदान्यर्हसि त्वं न धैर्या-
न्मोघीकर्तुं चटुलशफरोद्वर्तन प्रेक्षितानि॥

प्रतिबिंबित जब तुम होगे, गंभिरा के निर्मल जल में
समाँ जाओगे गहराई तक, चंचल प्यारभरे उस दिल में
चपल मछलीयाँ हीले तो जैसे, कटाक्ष करते नयन कमल से
समझ भावना उस के दिल कि, देखो के वो जरा न तरसे

पिया के तन को छूकर निकली हवा भी उसके प्रेमदाह के लिये औषधी का काम करती है।

भित्वा सद्यः किसलयपुटान्देवदारूद्रुमाणां
ये तत्क्षीरस्रुतिसुरभयो दक्षिणेन प्रवृत्ताः।
आलिङग्यन्ते गुणवती मया ते तुषारद्रिवाताः
पूर्वं स्पृष्टं यदि किल भवेदङगमेभिस्तवेति॥

फूँक मार कर हलके हलके, ऊंचे वृक्षो के पर्णों को
आते दक्षिण हवा के झोंके, मंद सुगन्धित छोड हिमगिरि को
शितल शौंख हवांओ को उन, क्यो न मैं आलिंगन दूँगा?
गुणवती ओ सखी-उन्होंने, तन को तेरे छुआँ ही होगा ।

 धन्यवाद…..


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